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चिंतन

चिंतन

क्या अब भी कुछ शेष है,

जो मैं बोलूँ या लिख दूँ ।

क्या अब भी कुछ अवशेष है,

जो मैं बोलूँ या लिख दूँ ।


क्या कुछ ऐसा लिखा गया है,

जिसपर हर दिल राज़ी हो ।

चाहें पादरी-पंडित हो,

चाहे मुल्ला - काज़ी हो।


क्या कुछ ऐसा लिखा गया है,

जिसमें सम्यक दर्शन हो ।

हर एक मानव हेतु

समभाव प्रेम प्रदर्शन हो ।


क्या कुछ ऐसा लिखा गया है,

जो सबमें प्रेम प्रवाहित कर दे ।

सब धर्मों के मूल को,

अपने में समाहित कर दे ।


क्या कुछ ऐसा लिखा गया है,

जिसे पढ़ हर मन शुद्ध होजाए।

जिसे जानकर-मानकर

हर मानव ही बुद्ध हो जाए।


गर अब तक ऐसा नहीं हुआ,

तो अभी लेखनी शेष है,

ऐसा परम अभिव्यक्ति ही,

बस मेरा अंतिम लक्ष्य विशेष है ।

:- सत्येन्द्र नारायण राय


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